मर्जर में खो गई शिक्षक की पहचान

जयप्रकाश रावत (संदेश महल)
विद्यालयों का एकीकरण (मर्जर) सरकार की उस नीति का हिस्सा है, जिसमें शिक्षा व्यवस्था को अधिक सशक्त, संगठित और संसाधन-सक्षम बनाने का उद्देश्य रखा गया था। यह नीतिगत निर्णय कागज़ों पर सधा हुआ, व्यावसायिक दृष्टि से तर्कसंगत और प्रशासनिक रूप से सुव्यवस्थित भले लगे, लेकिन जब हम ज़मीनी स्तर पर झांकते हैं — तो वहां एक गहरी चुप्पी, संत्रास और भावनात्मक असहायता सुनाई देती है — और यह चुप्पी किसी और की नहीं, शिक्षकों की है।

सूरतगंज विकासखंड, बाराबंकी जैसे अनेकों क्षेत्र आज ऐसे ही मर्ज हुए विद्यालयों के गवाह हैं, जहां शिक्षकों को या तो जबरन दूसरी जगह भेजा गया या फिर ‘संलग्न’ कर दिया गया। न समय दिया गया, न संवाद हुआ। उन्हें आदेश के एक टुकड़े ने एक स्थान से उखाड़कर दूसरे जगह पहुंचा दिया — जैसे वे किसी फाइल का पन्ना हों, भावना नहीं।

शिक्षक केवल कर्मचारी नहीं होते। वे विद्यालय की आत्मा होते हैं। जिस विद्यालय की दीवारों ने वर्षों तक उनके स्वर सुने हों, जिन ब्लैकबोर्ड पर उन्होंने पीढ़ियों को पढ़ाया हो, जिन बच्चों के जीवन में उन्होंने दिशा दी हो — उस जगह से जब उन्हें “मर्ज” के नाम पर हटाया जाता है, तो वह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं होता, वह एक शिक्षक की पहचान पर गहरा वार होता है।

क्या मर्ज प्रक्रिया में किसी ने यह जानने की कोशिश की कि इन शिक्षकों की मानसिक स्थिति क्या है? उन्हें अचानक एक ऐसे विद्यालय में भेज दिया गया जहां या तो छात्र बहुत कम हैं, या शिक्षक पहले से ही पर्याप्त हैं। कहीं-कहीं तो उन्हें केवल कार्यालयीय कागज़ों के ढेर में डाल दिया गया है — न पढ़ाना है, न सिखाना है — बस दिन गिनना है।

यह विडंबना है कि जिस सरकार ने “नेशनल एजुकेशन पॉलिसी” के तहत शिक्षक को शिक्षा-व्यवस्था का स्तंभ माना है, उसी व्यवस्था में शिक्षक को सबसे अधिक बेदखल और उपेक्षित किया जा रहा है।

क्या यह व्यवस्था की विफलता नहीं?

क्या यह अपेक्षा गलत है कि मर्जर से पहले शिक्षकों से संवाद हो? क्या यह असंभव है कि स्थानांतरण के लिए विकल्प पूछे जाएं? क्या यह व्यवस्था इतनी असंवेदनशील हो चुकी है कि शिक्षक के अनुभव, उसकी जड़ें, उसके रिश्ते — सबको मर्ज टेबल पर दरकिनार कर दिया जाए?

अब जरूरी है आत्मचिंतन

शिक्षक सिर्फ कर्मचारी संख्या नहीं, वह एक सामाजिक धुरी है।मर्जर नीति में मानवीय पहल जोड़ना अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।

शिक्षकों की भावनात्मक सुरक्षा और सम्मान, किसी भी सुधार नीति का मूल हिस्सा होना चाहिए।
विद्यालयों का मर्ज होना व्यवस्था का सुधार हो सकता है, लेकिन अगर इसमें शिक्षक की आत्मा को ही कुचल दिया गया, तो यह सुधार नहीं, शिक्षा के भविष्य का अपमान है।

error: Content is protected !!