जयप्रकाश रावत (संदेश महल)
गाँव के स्कूल में बारिश का पानी छत से टपकता है। बच्चों के बैठने के लिए व्यवस्था नहीं, पीने का पानी तक असुरक्षित। मिड-डे मील का हिसाब संदिग्ध, और शिक्षक अक्सर अनुपस्थित। ये सब दृश्य अब ‘सामान्य’ माने जाने लगे हैं। पर क्या इन्हें सचमुच सामान्य मान लिया जाए?
दरअसल, यह सब उस व्यवस्था की विफलता है, जिसे लोकतंत्र की जड़ों तक ले जाने की कोशिश के रूप में गढ़ा गया था—विद्यालय प्रबंधन समिति (SMC)।
जिस समिति को स्कूलों की निगरानी और संचालन में समाज की भागीदारी का आधार बनना था, वह आज प्रशासन और सत्ता के मौन सहयोग से निष्क्रियता की गर्त में समा चुकी है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE-2009) ने विद्यालयों की निगरानी के लिए SMC को अनिवार्य घोषित किया था। समिति में 75% सदस्य अभिभावक होने चाहिए। इसका उद्देश्य था कि स्कूल का संचालन शिक्षक और प्रशासन नहीं, समाज के प्रतिनिधि भी मिलकर करें। ताकि किसी भी स्तर की लापरवाही, भ्रष्टाचार या उपेक्षा पर तुरंत जवाबदेही तय की जा सके।
लेकिन दुखद यह है कि SMC का अस्तित्व अब महज़ रजिस्टर के एक कोने में दर्ज नामों तक सीमित है। न बैठकें होती हैं, न निर्णय। न आवाज़ उठती है, न विरोध दर्ज होता है।
यह चुप्पी किसकी है? और क्यों है?
एक ओर शिक्षकों को डर है कि जागरूक SMC उनकी गैरहाजिरी या कामचोरी पर सवाल पूछेगी। प्रधानों को भय है कि पारदर्शिता की माँग उनके नियंत्रण को कम कर देगी। और अधिकारियों को भी यह ‘निम्नस्तरीय हस्तक्षेप’ लगता है। ऐसे में SMC को बस एक न्यूनतम औपचारिकता बनाकर छोड़ दिया गया है।
दूसरी ओर, जिन अभिभावकों को समिति का हिस्सा बनाया गया है, वे कई बार यह तक नहीं जानते कि उनके अधिकार क्या हैं। उन्हें न प्रशिक्षण मिलता है, न जानकारी। वे पंचायत की राजनीति और शिक्षक की हैसियत से दबे हुए होते हैं। परिणामस्वरूप, समिति का लोकतंत्र वास्तव में एकाधिकार में बदल गया है।
जब स्कूल में शौचालय न बने हों, जब छात्रवृत्ति में कटौती हो रही हो, जब मिड-डे मील का अनाज गायब हो रहा हो — और समिति फिर भी मौन हो, तो यह मौन अनुभवहीनता नहीं, अपराध है।
SMC यदि ईमानदारी से काम करे, तो शिक्षा की बहुत सी बुनियादी समस्याओं का हल निकल सकता है। लेकिन इसे सक्रिय करना केवल सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं—यह समाज की भी परीक्षा है। गाँव के लोग, खासकर अभिभावक, यदि अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें स्कूल के मामलों में भागीदारी निभानी होगी।
अब समय आ गया है कि विद्यालय प्रबंधन समितियों को पुनर्जीवित किया जाए। इनकी बैठकों को सार्वजनिक किया जाए, निर्णयों को ग्रामसभा में पढ़ा जाए, और निष्क्रियता पर कठोर कार्रवाई हो। नहीं तो सरकार कितनी भी योजनाएँ बना ले, स्कूल के दरवाज़े खुले होने के बावजूद शिक्षा का रास्ता बंद रहेगा।