जेपी रावत संदेश महल
सीतापुर का बेल्ट कांड शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली का वह आइना है जिसमें पक्षपात, दबाव और चरित्रहीनता साफ झलक रही है। सहायक अध्यापिका अवंतिका गुप्ता के खिलाफ जारी सस्पेंशन आदेश खुद विभाग के शीर्ष अधिकारी को कठघरे में खड़ा कर रहा है।

आदेश में साफ उल्लेख है कि अध्यापिका ने एक माह तक उपस्थिति नहीं दी। यही आरोप तो शुरू से प्रधानाध्यापक महोदय लगाते आ रहे थे। सवाल यह है कि जब अनुपस्थिति का तथ्य स्पष्ट था, तब बीएसए सीतापुर प्रधानाध्यापक पर उपस्थिति दर्ज करने का दबाव क्यों बना रहे थे? और फिर इस अवैध दबाव का विरोध करने वाले प्रधानाध्यापक को ही कार्यालय में बुलाकर कठघरे में क्यों खड़ा किया गया? क्या यह न्याय है, या फिर पद की शक्ति का दुरुपयोग?
सच यही है कि शिक्षकों की एकजुटता और दबाव ने विभाग की कमजोर नस पर हाथ रखा। परिणामस्वरूप बीएसए को बैक डेट में जाकर अवंतिका गुप्ता का निलंबन करना पड़ा। परंतु यह निलंबन जितना अध्यापिका के खिलाफ है, उतना ही यह बीएसए के आचरण पर भी शिकंजा कसता है। क्योंकि आदेश की हर पंक्ति यह साबित करती है कि प्रधानाध्यापक सच बोल रहे थे और उन्हें झूठा साबित करने की कोशिश की जा रही थी।
अब यह सिर्फ एक अध्यापिका का मामला नहीं है। यह पूरी शिक्षा व्यवस्था की साख का प्रश्न है। यदि शीर्ष अधिकारी ही गलत दबाव डालेंगे, तो कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक कैसे अपना काम करेंगे? और सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन विवादों में बच्चों की पढ़ाई बर्बाद हो रही है। शिक्षा विभाग यदि अपने ही कर्मचारियों को पचड़ों में उलझाएगा तो मासूम बच्चों के भविष्य का क्या होगा?
आज ज़रूरत है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो। जिम्मेदार चाहे कोई भी हो—चाहे अध्यापिका, चाहे बीएसए—उसे सख्त से सख्त कार्रवाई का सामना करना चाहिए। क्योंकि शिक्षा से खिलवाड़ किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होना चाहिए।
सीतापुर का यह कांड एक चेतावनी है:
शिक्षकों की एकता ही अन्याय के खिलाफ सबसे बड़ी ढाल है।और अधिकारी यह याद रखें—सत्य दबाने की हर कोशिश अंततः उन्हें ही बेनकाब कर देती है।