दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन: बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश

जेपी रावत – संदेश महल
दशहरा, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है, केवल रावण पर भगवान राम की विजय का पर्व नहीं है, बल्कि यह जीवन में अच्छाई की शक्ति और बुराई पर विजय का प्रतीक भी है। इस दिन जलेबी, रावण पुतले और उत्सवों के बीच एक विशेष धार्मिक परंपरा का पालन किया जाता है – नीलकंठ भगवान के दर्शन।

नीलकंठ, भगवान शिव का वह रूप हैं, जिन्होंने समुद्र मंथन के समय उत्पन्न विष पीकर संसार की रक्षा की। उनके गले का नीला रंग उन्हें नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध करता है। दशहरे के दिन उनका पूजन और दर्शन करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। जैसे राम ने रावण का संहार कर धर्म की स्थापना की, वैसे ही नीलकंठ हमें जीवन में संकट और नकारात्मकता से पार पाने की शक्ति प्रदान करते हैं।

इस दिन नीलकंठ मंदिरों में भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है। लोग रूद्राभिषेक, दीप प्रज्ज्वलन और मंत्रों के उच्चारण के साथ उनकी पूजा करते हैं। माना जाता है कि दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और पापों का निवारण होता है। यह सिर्फ धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक चेतना को भी जागृत करता है।

नीलकंठ के दर्शन हमें यह संदेश देते हैं कि चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, अच्छाई और साहस की शक्ति से उनका सामना संभव है। इसलिए दशहरे पर केवल जलेबी खाना या रावण दहन करना ही नहीं, बल्कि नीलकंठ के दर्शन कर उनके आशीर्वाद से जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही त्योहार की वास्तविक गहराई और संदेश है – बुराई पर अच्छाई की विजय और संकट में धैर्य और स्थिरता की शक्ति।