
बाराबंकी जनपद का सूरतगंज कस्बा एक ऐसा स्थल है, जिसकी दीवारों में इतिहास की सांसें बसी हैं। यहां की जर्जर हो चुकी कोठी, ढहती दीवारें और वीरान पड़े आंगन उस दौर की कहानियाँ कह रहे हैं, जब रैकवार (रैयका) वंश का वैभव दूर-दूर तक गूंजता था। परंतु अफसोस! आज वही धरोहर उपेक्षा की आग में झुलस रही है और आसपास रहने वाले लोग भय और असुरक्षा की छाया में जीने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि आखिर किसकी जिम्मेदारी है इसे बचाने की? क्या हम सचमुच इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि अपनी ही धरोहर को मिट्टी में मिलते देख रहे हैं?
इतिहास की जड़ें और रैकवार वंश की विरासत
सूरतगंज का सीधा संबंध रैकवार वंश से है। माना जाता है कि इस वंश की उत्पत्ति राका देव से हुई, जिनके पुत्र साल देव और बाल देव ने इसे आगे बढ़ाया। इनकी शक्ति का केंद्र रामनगर-धमेरी रहा। यहीं से यह वंश पीढ़ी-दर-पीढ़ी फलता-फूलता रहा।
इसी वंश की कड़ी में राजा सरबजीत सिंह का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे रामनगर-धमेरी के नवें शासक बने और 1857 के समय गद्दी पर आसीन हुए। इतिहास गवाह है कि उनका दौर न केवल राजसी ठाठ-बाट का प्रतीक था बल्कि पतन की ओर जाता हुआ एक अध्याय भी।
राजा सरबजीत सिंह : विलासिता और पतन की कहानी
राजा सरबजीत सिंह के शासनकाल में वैभदव और अपव्यय दोनों चरम पर थे। अपव्ययी जीवनशैली ने राजघराने की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया। कर्ज और अव्यवस्था का बोझ इतना बढ़ गया कि 1888 में सम्पूर्ण जागीर को कोर्ट ऑफ वार्ड्स के प्रबंधन में लेना पड़ा। लगभग तेरह वर्षों तक यह संपत्ति अंग्रेजी हुकूमत के संरक्षण में रही और अंततः जुलाई 1901 में इसे पुनः जारी किया गया।
यह भी उल्लेखनीय है कि 4 दिसंबर 1877 को अंग्रेजी सरकार ने राजा की उपाधि को वंशानुगत मान्यता प्रदान की थी। किंतु राजसी गरिमा का यह ताज जिम्मेदारियों के बोझ के आगे टिक नहीं पाया।
परिवार और निजी जीवन
राजा सरबजीत सिंह का वैवाहिक जीवन भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। उनकी पहली शादी रानी चंद्र कुंवर से हुई थी, जो ठाकुर दुर्गा सिंह चंदेल की पुत्री थीं। किंतु उनकी असमय मृत्यु हो गई। इसके बाद दूसरी शादी रानी गुलाब कुंवर से हुई, जो बहराइच के ठाकुर बेनी प्रसाद सिंह की पुत्री थीं। इन्हीं से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई।
बेगम कादिरजहां और सूरतगंज की कोठी
इतिहास की परतों में यह भी दर्ज है कि राजा सरबजीत सिंह का गहरा संबंध बेगम कादिरजहां से रहा। उनके लिए सूरतगंज में एक भव्य कोठी का निर्माण कराया गया। यह कोठी कभी स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना और राजसी ठाठ-बाट की मिसाल मानी जाती थी। बेगम कादिरजहां ने अपना अधिकांश समय यहीं बिताया।
आज वही कोठी खंडहर में बदल चुकी है। कभी जिसके दरबार में शाही महफिलें सजती थीं, वहां अब खामोशी और जर्जरता का राज है। दीवारें गिर गई है। छज्जे टूट चुके हैं और छतें ढह चुकी है।स्थान वीरान हो गया है।आसपास रहने वाले लोग हर दिन इस डर में जीते हैं कि कहीं यह ढांचा अचानक मौत का कारण न बन जाए।
धरोहर का पतन और समाज की चुप्पी
यह कोठी केवल एक इमारत नहीं है, यह रैकवार वंश की स्मृति है,किंतु आज इसे देखने वाला सहेजने वाला कोई नहीं है।
स्थानीय लोग कहते हैं कि इसकी जिम्मेदारी राजा के वंशजों की है। पर क्या यह केवल उनकी जिम्मेदारी है? क्या समाज और शासन की कोई भूमिका नहीं है?
यह सवाल हमें झकझोरता है कि जब हम अपनी धरोहरों की रक्षा करने में असफल होते हैं तो भविष्य हमें किस रूप में याद करेगा? क्या हम केवल उपेक्षा और संवेदनहीनता के प्रतीक बनकर रह जाएंगे? सूरतगंज की कोठी केवल राजा सरबजीत सिंह की याद भर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है।