जयप्रकाश रावत- संदेश महल
सभ्यता की भव्य इमारतें ईंट और गारे से नहीं, बल्कि मेहनतकश हाथों के पसीने से खड़ी होती हैं। इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र का गौरव उसकी सेना या राजनीति से अधिक उसके श्रमिकों और शिल्पकारों के दम पर टिका होता है। भारतीय परंपरा में जब हम उस प्रथम शिल्पकार की खोज करते हैं, जो केवल औजारों से नहीं, बल्कि कल्पना और संकल्प से सृष्टि का विन्यास करता है, तो एक ही नाम सामने आता है—भगवान विश्वकर्मा।
देवताओं के अभियंता, वास्तु और शिल्प के आदि गुरु—यह संबोधन केवल उनकी महिमा का परिचय है, सम्पूर्ण नहीं। विश्वकर्मा वह शक्ति हैं जिन्होंने स्वर्ग के महलों से लेकर लंका के स्वर्णिम किले तक, विष्णु के सुदर्शन चक्र से लेकर शिव के त्रिशूल तक, और कृष्ण की द्वारका से लेकर पांडवों की इन्द्रप्रस्थ तक, हर निर्माण को अमरता दी। वे केवल वास्तुकार नहीं, बल्कि विज्ञान, कला और तकनीक की आत्मा हैं।
आज जब कारखानों में मशीनें गूंजती हैं, बिजली से चलने वाले यंत्र उत्पादन करते हैं, या कम्प्यूटर और रोबोट तकनीक के नए आयाम खोलते हैं, तब भी इन सबके पीछे एक अदृश्य प्रेरणा है—श्रम और कौशल। यही वह मूल्य है, जिसे विश्वकर्मा जयंती हर वर्ष याद दिलाती है। यह महज़ पूजा नहीं, बल्कि मेहनतकश वर्ग की गरिमा का पर्व है। उस वर्ग का, जो दिन-रात खामोशी से सभ्यता का पहिया घुमाता है, लेकिन जिसके हिस्से में अक्सर सम्मान की जगह उपेक्षा ही आती है।
आज का भारत जब विकसित भारत की ओर बढ़ रहा है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो उठता है—क्या हमारे समाज में मजदूर, कारीगर, मिस्त्री, लोहार, बढ़ई और तकनीशियन को वैसा ही आदर मिलता है, जैसा किसी बड़े अफसर या राजनेता को? क्या मशीनों को चलाने वाले हाथों को हम उसी गरिमा से देखते हैं, जैसी वे हक़दार हैं?
भगवान विश्वकर्मा का संदेश स्पष्ट है—सृजन ही पूजा है, श्रम ही साधना है।
अगर हम सच्चे अर्थों में उनकी पूजा करना चाहते हैं तो ज़रूरी है कि उन श्रमिक हाथों को सम्मान दें, जो देश की आर्थिक रीढ़ हैं। हर हथौड़ी की चोट, हर छैनी की रेखा, हर मशीन की गूंज—दरअसल वही आरती है जो विकास की सच्ची धुन छेड़ती है।
विश्वकर्मा हमें सिखाते हैं कि कोई भी समाज तब तक संपूर्ण नहीं हो सकता, जब तक वह अपने श्रमिक वर्ग को बराबरी का सम्मान न दे। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का सबसे महत्वपूर्ण सबक है।
इसलिए जब हम भगवान विश्वकर्मा का स्मरण करें तो यह याद रखें कि उनकी पूजा मंदिर की आरती से नहीं, बल्कि मजदूर के हाथों में पड़ी धूल को आदर देने से होती है। यही आदर हमारे भविष्य को सुदृढ़ और हमारी सभ्यता को शाश्वत बनाएगा।