सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

तपती रेत सी जिंदगी में,
कुछ बूंदों की बारिश तुम,
आहत मन, बिखरे भावों में,
छोटी सी हो ख्वाहिश तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

खाली-खाली सी शामों में,
एक कप चाय की प्याली तुम,
किसी दरख़्त की शाखों पर,
फूलों से लदी डाली तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

झोंका हो किसी खुशबू का,
या हो पूरा अतर तुम,
चहकते हुए परिंदों से,
या हो भरे शज़र तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

किसी डूबती कश्ती का,
मिल जाए वो साहिल तुम,
किसी भटकती राहों की,
दिख जाए वो मंजिल तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

लहर हो समंदर का,
या दरिया के गीत तुम,
रात के गहरे सन्नाटे में,
मनभावन संगीत तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

ठहरे-ठहरे से पानी में,
उठती हुई तरंग तुम,
किसी मासूम बचपन का,
अल्हड़ सा उमंग तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

कोरे सफेद कागज पर,
लिखी हुई गजल तुम,
ज़ख्मी रूह का मरहम,
या खुदा का फ़ज़ल तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

खुदा से जो मांगी थी,
वो मुकम्मल दुआ तुम,
रूह को जो छू जाए,
हो दिलकश अदा तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?

सदियों से जर्द अधरों पर,
खिली हुई मुस्कान तुम,
मैं कहां अब मैं रही,
मेरी तो पहचान तुम,
सोचती हूं, आखिर कौन हो तुम?