
हमारे समाज में जब भी “चरित्र” शब्द का उपयोग होता है, तो उसकी दिशा अनायास ही महिला की ओर मुड़ जाती है। पुरुष चाहे कितनी भी सीमाएं लांघे, कितने भी संबंध बनाए, उसे “बोल्ड”, “माचो” या “आधुनिक” कहकर महिमा मंडित किया जाता है, लेकिन एक औरत अगर अपने शरीर, इच्छाओं या जीवन की बागडोर स्वयं थाम ले, तो उस पर “चरित्रहीन” का ठप्पा लगाने में समाज देर नहीं लगाता।
मैंने भी एक दिन इस तथाकथित “चरित्रहीन” औरत की तलाश शुरू की — उस औरत की, जिसे समाज बार-बार शर्मिंदगी का लबादा ओढ़ाता रहा है। मैं उन गलियों में गया जहाँ औरतें देह के सौदे करती हैं, उन क्लबों में गया जहाँ वे नाचती हैं, उन संबंधों में झाँका जो विवाह के दायरे से बाहर थे। लेकिन जितना अधिक मैं खोजता गया, उतना ही यह समझ में आने लगा कि इन तमाम परिस्थितियों के पीछे अक्सर एक पुरुष खड़ा होता है — कोई ज़रूरत का फायदा उठाने वाला, कोई जबरदस्ती करने वाला, कोई धोखा देने वाला, कोई भोग की वस्तु समझने वाला।
आश्चर्य यह है कि जिन औरतों को समाज ने “चरित्रहीन” घोषित किया है, वे दरअसल अपनी परिस्थितियों, मजबूरियों या कभी-कभी अपने स्वयं के निर्णयों के साथ जी रही थीं। उनमें कहीं भी वो घिनौनी मानसिकता नहीं थी जिसे वास्तव में “चरित्रहीनता” कहा जाना चाहिए।
तो सवाल यह उठता है — चरित्रहीन कौन है?
एक औरत जो जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझ रही है, या वह पुरुष जो बार-बार उसे ठगता, इस्तेमाल करता और फिर समाज के सामने उसे दोषी ठहराता है?
“चरित्र” का मूल्यांकन केवल औरत के वस्त्रों, संबंधों या देह की आज़ादी से क्यों होता है? क्यों नहीं पुरुष के व्यवहार, उसकी नीयत और उसकी भूमिका को भी उसी कठघरे में खड़ा किया जाता?
हकीकत यह है कि “चरित्रहीन” शब्द हमारे समाज ने उस स्त्री के लिए गढ़ा है, जो उनके बनाए दायरे तोड़ती है। लेकिन उस दायरे को बनाने वाले अक्सर वही होते हैं जो खुद नैतिकता के सबसे निचले स्तर पर खड़े होते हैं।
समय आ गया है जब हमें “चरित्र” की परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा। हमें यह समझना होगा कि अकेले औरत ही चरित्रहीन नहीं होती। समाज को अपनी सोच का आईना देखने की ज़रूरत है — और उस आईने में अक्सर एक “कायर, कामुक, वासना की कीचड़ में सना पुरुष” दिखाई देगा, जिसने सबसे पहले औरत को चरित्रहीन कहा था।