फर्जी शिक्षक: 11 सालों से बच्चों के भविष्य से खिलवाड़

शिक्षा समाज के निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण नींव है। यह केवल बच्चों को पढ़ाने का माध्यम नहीं है, बल्कि उन्हें जीवन, मूल्य और नैतिकता का पाठ पढ़ाने का भी एक माध्यम है। लेकिन उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा विभाग में हाल ही में सामने आया खुलासा इस व्यवस्था की साख पर सवाल खड़ा करता है। सहायक अध्यापक पदों पर नियुक्त 22 शिक्षक 11 वर्षों तक फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी करते रहे। यह केवल व्यक्तिगत फर्जीवाड़ा नहीं है, बल्कि यह सरकारी संसाधनों और शिक्षा व्यवस्था दोनों के लिए भयंकर घोटाला है।

11 साल का घोटाला

ये नियुक्तियां वर्ष 2014 में आजमगढ़ मंडल में हुई थीं। एलटी ग्रेड में शिक्षकों की शुरुआती वेतन लगभग 55 हजार रुपये प्रति माह थी, जो वरिष्ठता के अनुसार अब लगभग 75 हजार रुपये तक पहुंच गई है। औसत 60 हजार रुपये मानकर देखें तो केवल एक शिक्षक का एक वर्ष का वेतन लगभग 7,20,000 रुपये होता है। 11 वर्षों में यह आंकड़ा लगभग 79,20,000 रुपये बनता है।

अब सोचिए, 22 फर्जी शिक्षक—सरकारी खजाने से कितने करोड़ों रुपये का गबन कर चुके हैं। इतना बड़ा घोटाला और विभाग का 11 वर्षों तक निष्क्रिय रहना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम पर हमला है।

कौन हैं ये फर्जी शिक्षक?

ये शिक्षक सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। ये 22 लोग मऊ, बाराबंकी, लखनऊ, बुलंदशहर, सहारनपुर, कानपुर देहात, मीरजापुर, आजमगढ़, जौनपुर और बलिया के सरकारी स्कूलों में पढ़ाते रहे। गणित, विज्ञान, अंग्रेजी, हिंदी, गृह विज्ञान—हर विषय में ये शिक्षक बच्चों को सही शिक्षा देने में असफल रहे। उनके फर्जी प्रमाणपत्रों के कारण बच्चों का भविष्य अधूरा और भ्रमित हुआ।

सूची में शामिल शिक्षक:

1. विनय कुमार यादव – गणित/विज्ञान, मऊ
2. पवन कुमार – जीव विज्ञान, बाराबंकी
3. अतुल प्रकाश वर्मा – अंग्रेजी, बाराबंकी
4. अंकित धर्मा – हिंदी, बाराबंकी
5. लक्ष्मी देवी – गणित/विज्ञान, बाराबंकी
6. विवेक सिंह – जीव विज्ञान, मऊ
7. राज रजत वर्मा – अंग्रेजी, लखनऊ
8. रोहिणी शर्मा – गणित/विज्ञान, लखनऊ
9. अमित गिरी – सामान्य विषय, बुलंदशहर
10. रूचि सिंघल – अंग्रेजी, सहारनपुर
11. प्रियंका – गृह विज्ञान, बाराबंकी
12. नूतन सिंह – अंग्रेजी, कानपुर देहात
13. दीपा सिंह – हिंदी, मीरजापुर
14. अनीता रानी – हिंदी, मऊ
15. प्रीति सिंह – अंग्रेजी, आजमगढ़
16. नंदिनी – गृह विज्ञान, जौनपुर
17. आनंद सोनी – अंग्रेजी, बाराबंकी
18. गीता – हिंदी, आजमगढ़
19. सलोनी अरोरा – अंग्रेजी, बाराबंकी
20. किरन मौर्या – सामान्य विषय, बलिया
21. रूमन विश्वकर्मा – सामान्य विषय, आजमगढ़
22. सरिता मौर्या – सामान्य विषय, बलिया

इस सूची को देखकर साफ है कि यह समस्या केवल एक जिले या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह पूरे मंडल और राज्य स्तर पर शिक्षा प्रणाली की सख्त निगरानी की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

प्रशासनिक विफलता

11 वर्षों तक फर्जी शिक्षक नौकरी कर सकते हैं और किसी को भनक तक न लगे। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की गंभीर विफलता है।

स्थानीय और विभागीय अधिकारियों की अनदेखी

इन सब ने मिलकर इस घोटाले को संभव बनाया। सरकार और विभाग के लिए यह न केवल एक शर्मनाक स्थिति है, बल्कि यह चेतावनी भी है कि शिक्षा व्यवस्था की गहरी दरारें हैं।

आर्थिक और सामाजिक नुकसान

सरकारी संसाधनों की हानि केवल धन की सीमा में नहीं रुकती। यह बच्चों के भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता के साथ धोखाधड़ी है। 22 फर्जी शिक्षकों ने लगभग 11 साल तक सरकारी वेतन और भत्ते प्राप्त किए। इसका प्रभाव बच्चों की पढ़ाई, उनके मानसिक विकास और शिक्षा के स्तर पर पड़ा।

साथ ही, समाज में शिक्षा और सरकारी प्रणाली के प्रति भरोसा भी कमजोर हुआ। आम जनता का विश्वास यह सोचने लगा कि सरकारी नौकरी सिर्फ लाभ के लिए है, गुणवत्ता और जिम्मेदारी की कोई अहमियत नहीं।

तत्काल कदम और समाधान

1. सख्त कानूनी कार्रवाई: फर्जी प्रमाणपत्र धारकों पर तुरंत एफआईआर, वेतन रिकवरी और सख्त दंडात्मक कार्रवाई।

2. भर्ती प्रक्रिया में सुधार: डिजिटल सत्यापन, प्रमाणपत्रों का कड़ा प्रमाणीकरण और भर्ती प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता।

3. निगरानी और ऑडिट: स्कूलों और शिक्षकों का नियमित ऑडिट और सत्यापन।

4. जनजागरूकता: अभिभावकों और समाज को शिक्षकों की योग्यता और बच्चों की पढ़ाई पर नजर रखने के लिए प्रेरित करना।

बच्चों और समाज पर प्रभाव

शिक्षक समाज के निर्माण में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। यदि शिक्षक ही फर्जी हों, तो बच्चों का भविष्य अधूरा, कमजोर और धोखाधड़ी का शिकार बनेगा। सरकारी और मिशनरी स्कूल समाज के कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ऐसे में फर्जी शिक्षक सरकार, समाज और बच्चों के सपनों से खेल रहे हैं।
यह मामला शिक्षा प्रणाली में सुधार की सख्त आवश्यकता को रेखांकित करता है। केवल कड़ी कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है। भर्ती प्रक्रिया में सुधार, डिजिटल सत्यापन, ऑडिट और अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। तभी शिक्षा व्यवस्था विश्वसनीय और पारदर्शी बन पाएगी।

निष्कर्ष: चेतावनी और आवाहन

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा विभाग में फर्जी शिक्षक मामले ने शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता को उजागर किया है। बच्चों का भविष्य, शिक्षा का स्तर और सरकारी संसाधनों की सुरक्षा सभी इस मुद्दे से प्रभावित हैं। समय की मांग है कि प्रशासन, सरकार और समाज मिलकर इस समस्या का कड़ा और स्थायी समाधान निकालें।
यदि अब सुधार नहीं हुए, तो शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और देश के भविष्य पर गहरा संकट मंडराएगा। बच्चों का भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता कभी समझौता नहीं हो सकती। यह समय की चेतावनी है—यदि सिस्टम चुप रहा, तो आने वाली पीढ़ी के सपनों और उम्मीदों पर हमला होगा।

✍️ – जयप्रकाश रावत
स्वतंत्र लेखक, हिंदी विकिपीडिया सहयोगी और ‘संदेश महल’ के संपादक हैं। शिक्षा,समाज और भाषा विषयों पर नियमित लेखन- Mo- 6306315316-9455542358
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