ठेकेदार की मनमर्जी के आगे बेबस शिक्षा व्यवस्था भवन को तरसे विद्यार्थी

सिरोही राजस्थान संदेश महल समाचार
भटाना पादर ग्राम पंचायत मुख्यालय स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पादर आज अव्यवस्था और लापरवाही की जीती-जागती तस्वीर बन चुका है। करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाला विद्यालय भवन कागजों और दावों में तो आगे बढ़ता दिख रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि 8 से 9 महीने बीत जाने के बावजूद निर्माण कार्य की एक ईंट तक नहीं रखी गई।सरकार द्वारा लगभग 2 करोड़ 20 लाख रुपये की राशि स्वीकृत कर वर्क ऑर्डर जारी किया गया था, ताकि क्षेत्र के विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षिक वातावरण मिल सके। लेकिन जिम्मेदार ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों की उदासीनता ने इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।22 मार्च 2026 को प्रकाशित खबर के बाद ठेकेदार और जिला उप शिक्षा अधिकारी ने 7 दिन में काम शुरू कराने का आश्वासन दिया था। वहीं ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने तो यह तक दावा कर दिया कि मौके पर निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। लेकिन आज भी विद्यालय परिसर में सन्नाटा पसरा है—न मशीनें, न मजदूर, और न ही किसी निर्माण की हलचल।
चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि मुख्य ठेकेदार, जो मुंबई में निवास करता है, उसने स्वीकृत राशि में से लगभग 1 करोड़ 85 लाख 30 हजार रुपये किसी छोटे ठेकेदार को दे दिए हैं। ऐसे में निर्माण कार्य की गुणवत्ता और समयसीमा दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।इधर, सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं मासूम विद्यार्थी। भीषण गर्मी के इस दौर में वे खुले आसमान के नीचे, पेड़ों की छांव में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। न पर्याप्त कक्षाएं हैं, न पंखे, न पीने के पानी की समुचित व्यवस्था—ऐसे में शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा, यह बड़ा सवाल है।यह मामला केवल एक भवन निर्माण में देरी का नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते तंत्र और खोखले दावों का आईना है। जब अधिकारी ही जमीनी सच्चाई से आंखें मूंद लें और कागजों में काम पूरा दिखाने लगें, तो आम जनता और विद्यार्थियों का भरोसा कैसे कायम रहेगा?अब आवश्यकता है कि जिला प्रशासन इस पूरे प्रकरण की गंभीरता से जांच कराए, दोषी ठेकेदार और अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करे, और तत्काल निर्माण कार्य शुरू कराकर समयबद्ध तरीके से पूरा कराए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक भवन का नहीं है, बल्कि उन बच्चों के भविष्य का है, जो आज भी शिक्षा के अधिकार के लिए पेड़ों के नीचे बैठने को मजबूर हैं।