धुएँ के बिना उठता सवाल

धुएँ के बिना उठता सवाल

जेपी रावत – संदेश महल
विद्यालय का गेट खुलते ही एक अलग ही दुनिया शुरू हो जाती है। दीवारों पर अनुशासन टंगा रहता है, बरामदों में नैतिकता घूमती है और हर कोने में भविष्य की तैयारी चल रही होती है। मैं कैमरा और डायरी लिए एक स्कूल कार्यक्रम की न्यूज कवरेज के लिए पहुँचा था।
कार्यक्रम शुरू होने से पहले शिक्षकगण इधर-उधर व्यस्त थे। तभी एक शिक्षक मेरी ओर बढ़े। चेहरे पर सौम्यता थी, लहजे में अपनापन। लगा, शायद कार्यक्रम की जानकारी देंगे या बच्चों की उपलब्धियों पर कुछ बताएँगे।
उन्होंने पास आकर धीमी आवाज़ में पूछा—
“आप सिगरेट लेते हैं?”


मैं एक पल को ठिठक गया। सामने बच्चों की कतारें थीं, दीवार पर बड़ा सा बोर्ड लगा था— ‘तंबाकू निषेध क्षेत्र’। सवाल और माहौल का मेल ऐसा था, जैसे प्रार्थना सभा में मोबाइल की रिंग बज जाए।
“नहीं,” मैंने मुस्कराते हुए कहा।
शिक्षक ने इधर-उधर देखा, मानो जवाब से ज़्यादा माहौल का आकलन कर रहे हों। बातचीत वहीं खत्म हो गई, पर कहानी शुरू हो चुकी थी।
कवरेज चलती रही—तस्वीरें, भाषण, तालियाँ। सब कुछ ठीक-ठाक। मगर मेरे दिमाग में बार-बार वही सवाल घूमता रहा। शायद यह सवाल मुझसे नहीं, उस छवि से पूछा गया था जो अक्सर पत्रकारों के साथ जोड़ दी जाती है—रात की चाय, अधूरी नींद और हाथ में सिगरेट।
विडंबना यह थी कि जिस जगह बच्चों को बुरी आदतों से दूर रहने का पाठ पढ़ाया जाता है, वहीं एक वयस्क ने बिना सोचे वही आदत किसी और पर टाँक दी।
कार्यक्रम समाप्त हुआ। स्कूल पीछे छूट गया, लेकिन वह सवाल साथ चल पड़ा—
क्या हम इंसान को पहचानने से पहले उसकी आदत तय कर लेते हैं?
उस दिन मेरी सबसे रोचक खबर किसी मंच पर नहीं थी। वह तो एक साधारण-सा सवाल था, जिसने सोच का आईना दिखा दिया—बिना धुएँ के, लेकिन गहरा असर छोड़ते हुए।