415 साल में पहली बार इस वर्ष नहीं लगेगा ठुठवा मेला

रिपोर्ट
उमेश बंसल
लखीमपुर-खीरी संदेश महल

कार्तिक पूर्णिमा पर 415 सालों से लगता आ रहा मेला इस बार नहीं लगेगा।
किंवदंती प्रचलित हैं कि सरयू नदी किनारे जागड़ा राजा मित्र राजाओं के साथ रुककर जनता दरबार लगाते थे। राजतंत्र समाप्त होने के बाद भी यहां जनता दरबार लगता रहा। बस फर्क बस इतना था तब राजाओं का जनता दरबार था और अब जनता और सत्ता के मिलन का जरिया बन गया। भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा सहित सभी दलों के नेता अपने पंडाल लगाकर जनता से मेले में रूबरू होते थे, लेकिन कोरोना संकट के चलते चार सौ वर्ष पुरानी इस परंपरा को इस बार ग्रहण लग गया है। इस बार मेला नहीं लगेगा। इससे राजा रंजीत सिंह के वंशज राजा राजेंद्र प्रताप सिंह सहित क्षेत्र के लोग काफी दुखी है।मेले की जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में रहती थी। इसकी वजह राजनीतिक दलों का जमावड़ा भी था। इस बार मेले की कोई अनुमति नहीं मिली है। न ही किसी प्रशासनिक अधिकारी ने मेला भूमि का चिह्नीकरण किया है।

ऐतिहासिक ठुठवा मेला तो इस बार नहीं लगेगा, लेकिन धार्मिक व्यवस्था को देखते हुए सरयू नदी में स्नान करने की छूट होगी। श्रद्धालुओं को कोविड नियमों का पालन करना होगा। घाटों पर पुलिस व्यवस्था रहेगी। एसडीएम एस सुधाकरन ने बताया कि कोविड नियमों का पालन करते हुए लोग सरयू नदी में स्नान कर सकते हैं।अवध की सांस्कृतिक विरासत की झलक के साथ धार्मिक आस्था की विरासत इस मेले की पहचान है।
लगभग 415 वर्ष पहले जांगड़ा राजा रंजीत सिंह ने यह मेला कराया था। तब से मेला होता चला आ रहा है।कतकी मेले के नाम से मशहूर इस मेले में ग्रामीण परिदृश्य की अमिट छाप देखने को मिलती थी।

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