बाढ़ के मेंढक: संकट में पहचानें असली और नकली साथियों की प्रेरक कहानी

जेपी रावत
संपादक संदेश महल

बरसात का मौसम था। नदी उफान पर थी। गांव के चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। हर तरफ एक अजीब-सा शोर था। तालाबों, गड्ढों और नालों में बैठे मेंढक लगातार टर्रा रहे थे। ऐसा लगता था मानो पूरी दुनिया उन्हीं की आवाज से चल रही हो।
लेकिन गांव के बुजुर्ग रामसहाय अक्सर कहा करते थे।

बेटा, बाढ़ के मेंढकों की आवाज से कभी भ्रमित मत होना। पानी उतरते ही उनकी औकात सामने आ जाती है।
उस समय कोई उनकी बात का मतलब नहीं समझता था।

गांव में एक युवक था अभय। वह समाज सेवा करता था। गरीबों की मदद करता, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता और गांव के विकास के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाता था। धीरे-धीरे उसकी पहचान बनने लगी।
जब अभय सफल होने लगा तो उसके आसपास लोगों की भीड़ जुटने लगी। हर कोई उसका शुभचिंतक बन गया। कोई उसे अपना भाई बताता, कोई मित्र, तो कोई सबसे बड़ा समर्थक।
लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
एक दिन अभय ने गांव में हुए बड़े घोटाले का खुलासा कर दिया। जिन लोगों के चेहरे बेनकाब हुए, वे प्रभावशाली और धनवान थे। उन्होंने अभय को बदनाम करना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलने लगीं। झूठे आरोप लगाए गए। मुकदमे की धमकियां दी जाने लगीं।
सबसे दुखद बात यह थी कि जो लोग कल तक अभय के साथ तस्वीरें खिंचवाते थे, वही लोग अब उससे दूरी बनाने लगे।
कुछ ने फोन उठाना बंद कर दिया।
कुछ ने कहा “भाई, हम तो पहले ही कह रहे थे कि ज्यादा समाज सेवा ठीक नहीं होती।”
कुछ ने सलाह दी “समझौता कर लो, वरना बर्बाद हो जाओगे।”
अभय को पहली बार समझ में आया कि भीड़ और साथ में कितना फर्क होता है।
एक शाम वह निराश होकर गांव के बाहर पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठा था। तभी रामसहाय बाबा वहां पहुंचे।

उन्होंने पूछा “क्या हुआ बेटा?

अभय की आंखें भर आईं।
उसने कहा “बाबा, जिन लोगों के लिए लड़ाई लड़ी, आज वही लोग साथ छोड़ गए।
रामसहाय बाबा मुस्कुराए और बोले
“बेटा, यह दुनिया बाढ़ के मेंढकों से भरी पड़ी है। जब तक पानी चढ़ा रहता है, वे सबसे ज्यादा शोर मचाते हैं। लेकिन संकट आते ही सबसे पहले गायब भी वही होते हैं।”
फिर उन्होंने अभय के कंधे पर हाथ रखकर कहा

याद रखो, संघर्ष के दिनों में जो तुम्हारे साथ खड़ा रहे, वही अपना है। बाकी सब मौसम के व्यापारी हैं।
यह बात अभय के दिल में उतर गई।
उसने तय कर लिया कि वह सत्य का रास्ता नहीं छोड़ेगा।

समय बीतता गया।
जांच हुई। सच सामने आया। घोटालेबाज बेनकाब हुए। जिन लोगों ने अभय को बदनाम किया था, वे स्वयं कटघरे में खड़े थे।
और जो लोग कभी उसका मजाक उड़ाते थे, वही लोग फिर उसके आसपास मंडराने लगे।
लेकिन इस बार अभय बदल चुका था।
वह मुस्कुराकर सबको देखता और मन ही मन कहता।

मैं अब बाढ़ के मेंढकों को पहचानता हूं।
जीवन में सफलता से ज्यादा महत्वपूर्ण है संघर्ष। क्योंकि सफलता लोगों की भीड़ लाती है, लेकिन संघर्ष लोगों का असली चेहरा दिखाता है। जो व्यक्ति कठिन समय में भी सत्य, साहस और ईमानदारी का साथ नहीं छोड़ता, अंततः वही सम्मान और विजय प्राप्त करता