मिट्टी की खुशबू से प्रशासनिक कुर्सी तक: एक किसान की बेटी की उड़ान

एक किसान की बेटी की उड़ान

जेपी रावत
संपादक संदेश महल

ग्रामीण भारत की पगडंडियों से निकलकर जब कोई बेटी प्रशासनिक सेवा की ऊँचाइयों तक पहुंचती है, तो वह सिर्फ अपनी सफलता की कहानी नहीं लिखती, बल्कि पूरे समाज के सोचने का नजरिया बदल देती है। जनपद बाराबंकी के सफदरगंज थाना क्षेत्र के मुबारकपुर गांव की रहने वाली प्रियंका वर्मा की उपलब्धि भी ऐसी ही एक प्रेरक गाथा है, जो संघर्ष, संकल्प और साधारण जीवन की असाधारण जीत को दर्शाती है।
किसान पिता दिनेश कुमार वर्मा के घर जन्मी प्रियंका ने बचपन से ही अभावों को बहुत करीब से देखा। खेतों में पसीना बहाते पिता और घर की जिम्मेदारियों के बीच पली-बढ़ी प्रियंका के लिए शिक्षा कोई सहज यात्रा नहीं थी, बल्कि एक निरंतर संघर्ष था। बावजूद इसके, उन्होंने कभी अपने सपनों को छोटा नहीं होने दिया। वर्ष 2018 में साईं इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने जिस दृढ़ता के साथ प्रशासनिक सेवा में जाने का निर्णय लिया, वही उनकी सफलता की नींव बन गया।
ग्रामीण परिवेश में अक्सर उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त संसाधन और मार्गदर्शन का अभाव होता है। लेकिन प्रियंका ने इन सीमाओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने भूगोल विषय से स्नातकोत्तर (एमए) की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद पूरी निष्ठा के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गईं। यह तैयारी केवल किताबों तक सीमित नहीं थी, बल्कि आत्मअनुशासन, समय प्रबंधन और निरंतर आत्ममूल्यांकन का भी एक सशक्त उदाहरण थी।
पहले ही प्रयास में नायब तहसीलदार के पद पर चयनित होना यह साबित करता है कि सफलता भाग्य का खेल नहीं, बल्कि सतत परिश्रम और स्पष्ट लक्ष्य का परिणाम होती है। प्रियंका की इस उपलब्धि ने यह मिथक भी तोड़ दिया है कि बड़े सपने केवल बड़े शहरों में ही पूरे होते हैं। उन्होंने यह दिखा दिया कि यदि इरादे मजबूत हों, तो गांव की गलियों से भी प्रशासनिक सेवा के दरवाजे तक पहुंचा जा सकता है।
यह सफलता केवल एक बेटी की जीत नहीं है, बल्कि उस किसान पिता के त्याग और विश्वास की भी जीत है, जिसने अपनी सीमित आय के बावजूद बेटी की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। यह उन सभी अभिभावकों के लिए भी एक प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने बच्चों के सपनों को सीमित कर देते हैं।
प्रियंका वर्मा की कहानी समाज के लिए कई स्तरों पर संदेश देती है। यह बताती है कि बेटियां आज हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही हैं और उन्हें केवल अवसर और प्रोत्साहन की आवश्यकता है। साथ ही यह शासन-प्रशासन के लिए भी एक संकेत है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, मार्गदर्शन और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बेहतर ढांचा उपलब्ध कराया जाए, तो ऐसे अनगिनत प्रतिभाशाली युवा देश की सेवा में आगे आ सकते हैं।मुबारकपुर गांव में आज जो उत्साह और गर्व का माहौल है, वह इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति की सफलता पूरे समाज को ऊर्जा देने का काम करती है। प्रियंका की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गई है-एक ऐसी रोशनी, जो यह संदेश देती है कि कठिनाइयां चाहे जितनी भी हों, यदि मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं।
निस्संदेह, प्रियंका वर्मा की यह सफलता केवल एक पद प्राप्त करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास की जीत है कि “सपने वही सच होते हैं, जिन्हें देखने का साहस और पूरा करने का संकल्प हो।