उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटा जनपद बाराबंकी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह पावन तीर्थ है, जहाँ की मिट्टी आज भी वीरों की शौर्यगाथा सुनाती है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इस धरती ने बलभद्र सिंह जैसे किशोर योद्धाओं की शहादत देखी, जिनकी वीरता का लोहा अंग्रेज भी मानने को विवश हुए। यहाँ के रणबांकुरों ने अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दी और अपने रक्त से स्वतंत्रता का बीज बोया।
इसी धरती ने आगे चलकर एक और अमर सेनानी को जन्म दिया — ग्राम गगौरा के चंद्रशेखर तिवारी।
सैनिक से क्रांतिकारी तक का सफर
सन 1938 में युवा चंद्रशेखर ने राजपूत रेजीमेंट में भर्ती होकर सेना की वर्दी पहनी। लेकिन मात्र तीन वर्ष बाद उनके अंतर्मन ने फौजी नौकरी को त्यागने और मातृभूमि की मुक्ति के लिए समर्पित होने का आह्वान किया।
सन 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उद्घोष —
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
— उनके हृदय को इस कदर आंदोलित कर गया कि वे नवनवेली दुल्हन को छोड़कर, परिवार की जिम्मेदारियाँ भुलाकर कोलकाता पहुँचे और आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गए।
जेल की काल कोठरी और यातनाएँ
अंग्रेजों से मुठभेड़ में वे पकड़े गए और महाराष्ट्र की नासिक जेल की काल कोठरियों में डाल दिए गए। तीन वर्षों तक भीषण यातनाएँ झेलीं, लेकिन न उनके हौसले टूटे, न ही देशप्रेम का जज्बा कम हुआ।
इतिहास गवाह है कि जब वे 1946 में जेल से रिहा हुए तो स्वयं महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू तांगे पर सवार होकर कारागार के द्वार पर उनका स्वागत करने पहुँचे। यह क्षण उनकी महानता का साक्षी है।
भारत छोड़ो आंदोलन में अगुवाई
जेल से लौटकर उन्होंने गांधीजी और नेहरूजी के साथ अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। उनकी प्रतिबद्धता इस बात की गवाही देती है कि स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई में भी बाराबंकी का यह सपूत अग्रिम पंक्ति में था।
पर स्वतंत्र भारत में उपेक्षा
देश स्वतंत्र हो गया, पर स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर तिवारी का परिवार उपेक्षा का शिकार बन गया।
77 वर्षीय छन्नू तिवारी बताते हैं —
“पिता ने आज़ादी के लिए सब कुछ त्याग दिया, लेकिन आज उनके नाम की एक पट्टिका तक विकासखंड परिसर के शिलालेख पर दर्ज नहीं है। समाधि स्थल जर्जर पड़ा है, सरकार और प्रशासन से कितनी बार गुहार लगाई, पर कोई सुनवाई नहीं हुई।”
सवाल जो हमें झकझोरते हैं
आज़ाद भारत की हवा में साँस लेते हुए जब हम चंद्रशेखर तिवारी जैसे रणबांकुरों की गाथा सुनते हैं, तो गर्व के साथ-साथ पीड़ा भी होती है।
क्या यह राष्ट्र अपने सच्चे नायकों को भुला देगा?
क्या उनका परिवार इसी अभाव और उपेक्षा में जीवन गुज़ारता रहेगा?
क्या यह सरकारों का दायित्व नहीं कि शहीदों और सेनानियों की स्मृतियों को संजोए और उनके परिवारों को सम्मान दे?
निष्कर्ष
बाराबंकी की धरती ने न केवल 1857 में अंग्रेजों से लोहा लिया, बल्कि स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई तक अपने सपूत न्यौछावर किए। चंद्रशेखर तिवारी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा देशप्रेम त्याग मांगता है। उनका नाम और योगदान इतिहास के पन्नों से ओझल नहीं होना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि सरकार और समाज मिलकर इस अमर सेनानी की स्मृतियों को संरक्षित करें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ समझ सकें कि आज़ादी हमें यूँ ही नहीं मिली, इसके पीछे गगौरा के चंद्रशेखर तिवारी जैसे लाखों बलिदानियों का लहू शामिल है।
