सागर विश्वविद्यालय में 1600 वर्ष पुरानी महिषासुर मर्दिनी प्रतिमा संरक्षित

बुन्देलखण्ड संदेश महल समाचार
नवरात्र के पावन दिनों में देशभर में शक्ति की उपासना का उत्सव मनाया जा रहा है। जगह-जगह भव्य पंडाल सजाकर माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की स्थापना की जा रही है। लेकिन बुंदेलखंड की धरती पर शक्ति आराधना कोई नई परंपरा नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत है। इसका सजीव प्रमाण आज भी सागर विश्वविद्यालय और राज्य पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित प्राचीन प्रतिमाओं के रूप में देखा जा सकता है।

डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नागेश दुबे के अनुसार यह क्षेत्र महाभारत काल में चेदी प्रदेश का हिस्सा रहा है। गुप्तकाल में एरन इस साम्राज्य की दूसरी राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था। इसी कालखंड की धरोहर मानी जाने वाली 1600 वर्ष पुरानी महिषासुर मर्दिनी प्रतिमा यहां संरक्षित है, जिसे शक्ति पूजन की सबसे प्राचीन मिसाल माना जाता है।

इतना ही नहीं, परमार, कलचुरी और चंदेल राजवंशों के काल में भी शक्ति स्वरूपों की अनगिनत प्रतिमाएं निर्मित की गईं। इनमें महिषमर्दिनी, चामुंडा, सप्तमातृकाएं, लक्ष्मी, गौरी, दुर्गा और पार्वती की मूर्तियां विशेष महत्व रखती हैं। इन प्रतिमाओं से यह स्पष्ट होता है कि बुंदेलखंड में देवी शक्ति की आराधना निरंतर होती रही है।

प्रो. नागेश दुबे का कहना है कि “यहां मिली प्रतिमाएं इस बात का साक्ष्य हैं कि शक्ति उपासना की परंपरा प्राचीन काल से लेकर आज तक अखंड रूप से चली आ रही है। यह क्षेत्र न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है, बल्कि कला और संस्कृति की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध रहा है।