जेपी रावत -संदेश महल
सीतापुर जनपद के नदवा प्राथमिक विद्यालय में हाल ही में घटित विवाद केवल एक स्कूल या एक शिक्षिका का मामला भर नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता का दर्पण है। जब प्रशासनिक शक्ति निष्पक्षता और न्याय की जगह पक्षपात और दबाव का औजार बन जाए, तो सबसे पहले शिकार बनता है शिक्षक वर्ग। और जब शिक्षक अपमानित होता है, तो दरअसल शिक्षा ही घायल होती है।
प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में वर्षों से यह शिकायत उठती रही है कि उच्चाधिकारी, चाहे वह बीएसए हों या खंड शिक्षा अधिकारी, अपने अधिकारों का उपयोग कभी-कभी व्यक्तिगत स्वार्थ, राजनीतिक दबाव या कागजी औपचारिकताओं के नाम पर करते हैं। शिक्षकों को छोटी-सी बात पर नोटिस थमाना, निलंबन आदेश जारी करना, या फिर जाँच रिपोर्ट को जान-बूझकर उलझाना आम बात बन गई है। इससे न केवल शिक्षक की गरिमा आहत होती है बल्कि विद्यालय का वातावरण भी प्रभावित होता है।
नदवा विद्यालय की घटना इस सच्चाई को सामने लाती है कि शिक्षा विभाग में शिक्षक की आवाज़ को दबाना आसान है। उच्चाधिकारी अक्सर “कर्तव्य पालन” की बजाय “दबाव पालन” में ज्यादा रुचि रखते हैं। जिस शिक्षिका का मामला है, उसके अनुपस्थित रहने या मेडिकल अवकाश के कागज़ों को विवाद का मुद्दा बना दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी भी आरोप की निष्पक्ष जाँच और समाधान शिक्षकों को अपमानित किए बिना नहीं किया जा सकता था?
शिक्षक सिर्फ़ एक कर्मचारी नहीं है, वह समाज के भविष्य का निर्माता है। जब उसे अपमानित किया जाता है, तो बच्चों के बीच उसका आत्मविश्वास टूटता है और शिक्षा का स्तर गिरता है। प्रदेश में लाखों शिक्षक आज इस डर में काम कर रहे हैं कि कहीं कोई छोटी सी चूक उनकी सालों की मेहनत को दागदार न कर दे।
जरूरत है कि शिक्षा विभाग आत्ममंथन करे। प्रशासन को यह समझना होगा कि कर्तव्यपालन का अर्थ शिक्षकों को शोषण के दबाव में लाना नहीं, बल्कि उन्हें सहयोग देकर बेहतर वातावरण उपलब्ध कराना है। शिक्षा सुधार केवल कक्षाओं में स्मार्ट बोर्ड लगाने या किताबें बाँटने से नहीं आएगा, बल्कि तब आएगा जब शिक्षक को गरिमा और न्यायपूर्ण माहौल मिलेगा।

नदवा की घटना हमें चेतावनी देती है कि यदि अब भी शिक्षक की आवाज़ को अनसुना किया गया, तो यह समस्या केवल एक जिले तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को खोखला कर देगी।