………परदा गिरने के बाद भी तालीयाँ बजती रहे।

 

 

 

 

  संपादक
जेपी रावत
संदेश महल समाचार

 

 

 

जिंदगी में बडी शिद्दत से निभाओ अपना किरदार,कि परदा गिरने के बाद भी तालीयाँ बजती रहे।

आर्यावर्त भारत वर्ष वर्तमान का हिन्दुस्तान बरबस ही मुख से निकल जाता है।सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमरा,हजारों साल की गुलामी में भी अपने सनातन वजूद को सुरक्षित रखते हुये दहकता रहा चहकता रहा महकता रहा, और सिसकता रहा।लेकिन अपने कर्म योद्धाओ के महाकौशल से शकुशल आजाद होकर नवसृजन के बिस्तार में हर कदम प्रगति का पाकर आज दुनियाँ में मिसाल कायम कर दिया है।आजाद भारत मे ङंकल प्रजाति की जो सियासत वजूद में आयी उसका खामियाजा देश भुगत रहा है।आदमियत खतम हो रही है। नियत बदल रही है। इन्सानित घायल है। मानवता बन्धक है।वातावरण में मायूसी है।पूरी ब्यवस्था दकियानूसी है।जिसके कारण ही बढ रही सरगोसी है। सत्ता के सितारे चमकते हैं फिर गर्दिश में चले जाते है।लेकिन यह धरणी धरा सबका गवाह बनकर केवल इतिहास का निर्माण करती रहती है।जिसको पढकर देखकर आने वाली पीढी सत्ता की सीढी पर चढने का प्र्यास करती है।आजाद भारत में तमाम राजनेता लाल किले पर भारतीय परचम को फहरा चुके हैं।उनके कर्मो के हिसाब से ही जनमानस में उनका प्रतिबिम्ब आज भी कायम है।

एक दशक से अजीब परिवर्तन चल रहा है। जिसके कारण देश के परिवेश में कहीं कटुता तो कहीं सम्प्रभुता का जश्न मनाया गया है।कश्मीर की शमशीर बदल गयी।सनातनी ब्यवस्था को सुशोभित करने वाली अयोध्या का कलंकित इतिहास मिट गया।तमाम शहरों के नाम बदल गये।राजपथो का नामकरण देश के महापुरूषो के नाम पर कर दिया गया।कहीं भी देश में बिद्वेश नहीं फैला।लेकिन आज जो हालात देश का हो गया है वह समरसता के लिये घातक साबित हो रहा है।देश के सम्बैधानिक ब्यवस्था में सियासत के सिपाहसलार निकम्मा साबित हो रहे है।मुट्ठी भर कार्पोरेट के चंगुल में देश का अंगुल अंगुल भर जमीन बन्धक बनाई जा रही है।किसान हताश है।निराश है।आज सड़कों पर धरना दे रहा है।प्रदर्शन कर रहा है।सरकार हठ बादिता पर अमादा है।इसी के कारण जनमानस मे उबाल बहुत ज्यादा है।सरकार के निकम्मापन के कारण ही खालिस्तान का नारा लगाने वाले वजूद मे आ गये।देश की स्मिता को ललकारने वाले गीदङ भी आवाज देने लगे।अगर किसान बिल पर बहस के बाद फैसला आता।किसान नेताओ की सहभागिता से कानून बनता।तो शायद आज जो कुछ हो रहा है वह नही होता। राष्ट्रीय एकता देश की सम्प्रभुता के नाम पर हुँकार भरने वाले आज जनता के सामने लज्जित नही होते नतमस्तक नहीं होते।और अराजक तत्वों को यह मौका नहीं मिलता फिल हाल बर्तमान केन्द्र सरकार के सामने बहुत बङा धर्म संकट आ खङा हुआ है।अङानी का खाद्यान्न भंङारण करने लिये हरियाणा में हजारो एकङ मे आधुनिक भंङारण गोदाम बनकर तैयार है।और उन्ही के इशारों पर काम कर रही सरकार है।कृषि कानून आज गले की हङ्ङी बन गया है।किसानो की सुना तो कारपोरेट नाराज होगा।कारपोरेट का सुना तो किसान नाराज।संसद में कानून बनाने के पहले किसान नेताओं से विचार-विमर्श क्यों नहीं किया गया यह सवाल जनमानस मे कौध रहा है।अब जबकि दिल्ली पर किसानों की भीड़ जमा होने लगी तो सरकार के होश फाख्ता हो गए।पंजाब और हरियाणा के किसान इस बार अपना राशन-पानी लेकर दिल्ली पहुंचे हैं। वे चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत के किसानों की तरह दो-चार दिन के लिए नहीं आए हैं। अच्छा होता कि प्रधानमंत्री खुद उनसे मिलने की पहल करते।अब भी सरकार सत्ता के अहंकार से मुक्त होकर किसानों से बात करेगी तो इस समस्या का सर्व हितकारी समाधान हो सकता है।खेती के संबंध में जो तीन कानून बने हैं, कुछ किसान नेता उन सभी को रद्द करने की मांग कर रहे हैं।लेकिन आंदोलनकारी किसानों का ध्यान मुख्य रूप से एक मुद्दे पर है। उन्हें शक है कि उनकी उपज पर उन्हें जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलता है और मंडियों में माल जिस आसानी से बिक जाता है।उनकी यह सुविधा चुप-चाप खत्म हो जाएगी।और वे बड़े-बड़े पूंजीपतियों की कंपनियों के हाथ के खिलौने बन जाएंगे। उनका अनाज व फसलें फिर मिट्टी के मोल बिकेंगी। इस पर सरकारका स्पष्टीकरण आना चाहीये अन्यथा तकरार बरकरार रहेगा ऐसा आसार देखने को मिल रहा है।
सरकार का कहना है कि यह दुष्प्रचार भर है। यह गलतफहमी है। इसे विपक्ष फैला रहा है। मान लिया कि यह ठीक है तो सरकार इस गलतफहमी को पिछले दो-ढाई माह में दूर क्यों नहीं कर सकी? भाजपा में प्रचार-पंडितों की कमी नहीं है।सरकार का आईटी सेल फेल क्यो है।उन्हें किसानों को एक बात ही समझानी है वह यह कि समर्थन मूल्य खत्म नहीं होगा।तो वे एमएसपी की घोषणा को कानूनी रूप क्यों नहीं दे देते? यह ठीक है,अभी भी उसके पीछे कानून नहीं है।लेकिन अब गलतफहमी इतनी फैल गई है कि उसे कानूनी रुप दे देने में सरकार को क्या संकोच है? कुछ अन्य मुद्दे भी हैं,जिन पर सहमति होना कठिन नहीं है।सरकार समय-समय पर फसलों की एमएसपी घोषित करती रहती है।अभी तक सिर्फ 23 फसलों पर यह होता है।जबकि भारत में कम से कम 200 तरह की फसलें होती हैं।पंजाब और हरियाणा में गेहूं और धान की फसलें सबसे ज्यादा मंडियों में बिकती हैं। सरकार इनकी सबसे बड़ी खरीद करती है। देश की कुल उपज का सिर्फ 6% माल ही मंडियों में बिकता है।बाकी 96% फसलों के लिए भी सरकार को कोई कमोबेश ‘दाम बांधो’ नीति बनानी चाहिए या नहीं? इन फसलों को बेचने वाले किसान ही गरीबी, बेकारी और लूट के शिकार होते हैं। उन्हें अपनी लागत से सवा या डेढ़ गुना कीमत मिले, इसका प्रबंध भी सरकार क्यों नहीं करती? केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने 16 सब्जियों के न्यूनतम मूल्य घोषित किए हैं। इनसे किसानों को अपनी लागत से 20% मूल्य ज्यादा मिलेगा।और उन्हें नुकसान होने पर 32 करोड़ रु. तक की सहायता सरकार देगी।आज के बदलते भारत मे चुपचाप कानून थोपना आसान नही है। सरकार को किसान हित को देखते हुये तत्काल पुनर्बिचार कृषि कानून पर करना चाहीये।यह देश हित मे होगा।

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