सबको हँसाने वाला रूला कर चला गया?

यूँ तो ऐ जिन्दगी तेरे सफर से शिकायतें बहुत थी।
मगर जब दर्द दर्ज कराने पहुँचे तो कतारें बहुत लम्बी थी।

भारतीय मशहूर उर्दू शायर और हिंदी फिल्मों के गीतकार राहत इंदौरी को संदेश महल समाचार पत्र परिवार की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि। संपादक जयप्रकाश रावत के साथ एक रिपोर्ट।

जिन्दगी का सफर कहाँ कब खत्म हो जाये कोई नही जानता कितने दिन इस दुनियाँ के रंगीन फिजा में जीवन के हसीन पल जी पायेंगे यह भविष्य हमेशा छिपा कर रखता है।फिर भी इस भौतिक बादी युग में किसी को कोई पहचानता नहीं।इस करोना के कहर में शहर के शहर गांव के गाँव बिना छाँव के हो गये, तमाम महान हस्तियां रूखसत कर गयी।
जिनके नाम की चर्चा सरेराह होती थी, महफिले गुलजार रहती थी। वह शख्सियत राहत इन्दौरी भी इस जहाँ को अलबिदा कह गये।अभी कुछ ही दिन पहले सियासत के मजे हुये खिलाङी तथा उद्योग पति अमर सिह जिनकी धमक हिन्दुस्तान की सियासत से लेकर फिल्मिस्तान की नफासत तक में कायम थी सब कुछ छोड़कर मुंह मोड़कर चले गये।तमाम फिल्मी सितारे भी किनारे लग गये। देश का परिवेश कोरोना के चलते हर तरफ तबाही के सन्देश से बिषाक्त हो चला है। बर्बादी का खेल शुरू है। जो कल तक हमारे अजीज थे वे कल की चीज होकर रह गये? गमगीन है शहर मुहल्ला उदास है।मशहूर शायर राहत इंदौरी का 70 साल की उम्र में हार्ट अटैक से निधन हो गया है।वो भी कोरोना वायरस से संक्रमित मिले थे।जिसके बाद उन्हें इंदौर के अरबिंदों अस्पताल में भर्ती कराया गया था।जहां इंदौरी ने अंतिम सांस ली।उनके निधन के बाद देश भर में शोक की लहर है।बुलाती है मगर जाने का नहीं।ये दुनियाँ है इधर जाने का नहीं?राहत इन्दौरी की हर लाईन मे रहस्य छिपा रहता था बहुत ही सलीके से अपने समाज की बात को रख देते थे।अभी तो कोई तरक़्की नहीं कर सके हम लोग।
वही किराए का टूटा हुआ मकां है मियाँ ? भारत के कोने कोने राहत इन्दौरी का नाम सबकी जुबा पर है। बदलता जमाना राहत इन्दौरी का दीवाना था। चाहे कालेज हो या आम जलसा या फिर शायरी का मंच राहत की बादशाहत हर जगह कायम रहती थी। निराला अन्दाज बेबाक टिप्पणी तालियों की गङगङाहट में सच की लगा देते थे झडी। आज इस देश की मिट्टी से पैदा बेशकिमती सितारा सबको यादों के समन्दर मे ङूबो कर चला गया, यह कहते हुये की दो गज ही सही ये मेरी मिलकियत तो है
ए मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया।
मुश्किलो के दौर से निकल कर दुनियाँ के फलक पर पहचान बनाने वाले शायर राहत को शुरुआती दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकीन वक्त किस पर कब मेहरबान हो जाये खुदा कब किसको हुनर बख्स दे कौन जानता है। तकदीर का सितारा जब चमकने लगता है तब जमाना झुक झुक कर अदब से सलाम करता है। कभी यह भी वक्त था उनका। अब हम मकान में ताला लगाने वाले हैं।
पता चला हैं की मेहमान आने वाले हैं ? आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर यही हकीकत है। सदियो से चला आ रहा प्रकृति का नियम अनादि आदि काल तक चलता रहेगा लोग आते रहेगे जाते रहेंगे जैसा कर्म वैसी चर्चा होती रहेगी। यह सही है कि सुगन्ध देर तक नहीं रहती मगर जितने समय तक रहती माहौल मे ताजगी भर देती है।
राहत इंदौरी का जन्म इंदौर में 1 जनवरी 1950 में कपड़ा मिल के कर्मचारी रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के यहाँ हुआ।था।यह दोनों की चौथी संतान थे। आपकी प्रारंभिक शिक्षा नूतन स्कूल इंदौर में हुई।आप इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की,और 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय,भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया,तत्पश्चात 1985 में मध्य प्रदेश के मध्य प्रदेश भोज
मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी।
मंगलवार 11 अगस्त की शाम लगभग 5 बजे आखिरी सांस ली।रात में करीब 10.30 बजे उन्हें इंदौर में सुपुर्दे-खाक कर दिया गया।
दुनिया को अलविदा कहने से पहले राहत इंदौरी ने कहा।
ख़ामोशी ओढ़ के सोई हैं मस्ज़िदें सारी,किसी की मौत का ऐलान भी नहीं होता। इस आखिरी शेर के साथ दुनिया से अलविदा कह गए।

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