पहले के समय पूजा करने का मतलब होता था “कुंडलिनी जागरण”

सौजन्य से-
वेद विभूषण सन्देश जी
अयोध्या धाम उत्तर प्रदेश

प्रस्तुतकर्ता
संदेश महल समाचार

सात प्रकार की तरंगे जो इन शब्दों से निकलती है।और जिन से बीज मन्त्र बनते हैं,इन सब मंत्रो की तरंगो का प्रभाव पड़ता है,हमारी कुंडलियो पर या सात चक्रों पर चक्रो पर प्रभाव पड़ने से ऊर्जा गतिशील होती है,और हारमोंस एक्टिव रहते हैं।

मनुष्य शरीर में सात कुंडलिनी बताई गई है।

मनुष्य शरीर में प्राण या
ऊर्जा को आप जिस चक्र पर स्थित करोगे ये उस चक्र पर आपके लिये फलदायी होगी।

हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं

1 मूलाधार चक्र
2 स्वाधिष्ठान चक्र
3 मणिपूर चक्र
4 अनाहत चक्र
5 विशुद्धख्य चक्र
6 आज्ञाचक्र
7 सहस्रार चक्र

(1) मूलाधार चक्र – ये गुदा और लिंग के बीच में होता है। यहाँ पर ऊर्जा केन्द्रित करने पर आप ओजस्वी तेजस्वी होते है इस चक्र के जागरण से वीरता और आनन्द का भाव प्राप्त होता है।

(2) स्वाधिष्ठान चक्र – इस को जागृत कर के अगले चक्र पर जाना चाहिए और इस चक्र के जागरण से भय, घृणा, क्रोध, हिंसा से मुक्ति मिलती है।

(3) मणिपूर चक्र – ये चक्र नाभि में होता है । मेरी भाषा में ये नाभि में है जहाँ पेट होता है जहाँ भूख होती है और आपको पता ही है भूख कभी ख़तम नहीं होती इस चक्र में रहने वाले की तृष्णा,विराम नही लेती है

(4) अनाहत चक्र – हृदय इस का स्थान होता है । यहाँ रहने या कह लो की अगर ये सुप्त पड़ा है तो अहंकार का जन्म यहीं होता है दम्भ, अविवेक यहाँ कूट कूट के भरा रहता है।इस चक्र का जागरण होना ही चाहिए। प्रेम, करुणा, मैत्री सब आ जाती है इस चक्र के जागरण से दया परोपकार आदि आदि गुणों का विकास होता है।

(5) विशुद्ध चक्र – ये कण्ठ में होता है और कंठ निवास स्थान है माँ सरस्वती का है । यहाँ से परमात्मा की आत्मा की झलक मिलने शुरू हो जाती है यहाँ पर एक साधक का जन्म होता है साधक साधना करने वाला जैसे गायक कलाकार नृत्य करने वाले संगीत वाले। बहुत ही तृप्तिदायी और आनंदपूर्ण जगह है।

(6) आज्ञाचक्र – ये हमारे आँखों के मध्य जहाँ टिक्का लगाते हैं वहां होता है यहाँ पर केन्द्रित होना या ऊर्जा को यहाँ पर लगाने का मतलब अब प्रकाश दूर नहीं अब ॐ नाद दूर नहीं है शिवजी का तीसरा नेत्र मतलब विवेक प्रज्ञा का केंद्र।

यहाँ तक की यात्रा करना मनुष्य जीवन का उद्देश्य होना चाहिए।

(7) “सहस्रार चक्र” यहाँ के लिए आपको इंतज़ार करना होता। शिव के आदेश का परमात्मा की पुकार का। ये निवास स्थान है शिव का, यहाँ पहुच कर मनुष्य स्वम शिव हो जाता है, यहाँ होता है आत्मा का परमात्मा से मिलन, ये परमधाम है। ये मोक्ष है, ये ज्ञान है, ये निर्वाण है।

इसके अलावा कोई गणित गुणा भाग नहीं है ।
पुराने समय में पूजा हुआ करती थी “कुण्डलिनी जागरण” इस जागरण में आहुति देनी होती है वासनाओ की लोभ, मोह, माया भय, घृणा, क्रोध, हिंसाकी

ये सब रूपक बन गए कुण्डलिनी जागरण के।
जब हम कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया करते हैं तो हम को अपनी पांच इन्द्रियों से इन सब की अनुभूति होती है।

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