बाराबंकी के नामचीन डॉ की बेटी अदाकारा मां कालीघाट की सीढ़ियों पर मांगतीं भीख

जेपी रावत
संदेश महल समाचार

अब के सफ़र में दर्द के पहलू अजीब हैं
जो लोग हम-ख़याल न थे हम-सफ़र हुए

पूर्णिमा देवी

खलील तनवीर की यह पंक्तियां उत्तर प्रदेश के जनपद बाराबंकी के नामचीन फिजिशियन रहे डाॅक्टर स्व एचपी दिवाकर की गंगा किनारे कालीघाट की सीढ़ियों पर भीख मांग रही पत्नी पूर्णिमा देवी पर बैठ रही है। जबकि इनकी बेटी
टीवी सीरियल और भोजपुरी फिल्मों की अदाकारा हैं। और पूर्णिमा देवी गुजरे अतीत में
केंद्र सरकार से सम्बद्ध संस्था नाट्य श्री में बतौर मुख्य गायिका लंबे समय तक गायन का गौरव हासिल किया है। किंतु वक्त की गर्दिश ने जब करवट ली तो अर्श से फर्श पर लाकर छोड़ दिया।एक रोटी के लिए विहार के दरभंगा हाऊस के निकट,गंगा किनारे,कालीघाट की सीढ़ियों पर सुरीली आवाज और हारमोनियम पर कांपती अंगुलियों की जुगलबंदी के समां के सहारे गायन से खुश होकर जिसने जो दे दिया उसी से वे अपना और बेटे का पेट भर लेती हैं।

पूर्णिमा का प्रारंभिक जीवन

29 दिसंबर 1945 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में महाकाल मंदिर के पुजारी हरिप्रसाद शर्मा के घर पूर्णिमा का जन्म हुआ था। आपने इंटर मीडियट तक पढ़ाई की थी, उसके बाद दाम्पत्य सूत्र में बंध गईं।

1945 में अक्टूबर माह में पूर्णिमा के दिन बेटी ने जन्म लिया।जन्मतिथि के अनुरूप पिता ने पूर्णिमा पुकारना शुरू कर दिया। पूजा-पाठ के माहौल में बचपन से ही पूर्णिमा का रूझान गीत-संगीत की ओर हो गया। उनकी संगीत साधना में पड़ोस में रहने वाले बंगाली दादा का बड़ा योगदान रहा। जिन्होंने पूर्णिमा को संगीत की बारीकियां सिखाईं और सुरों की तालीम दी। पूर्णिमा देवी ने लोकगायन को अपना कैरियर बनाना तय कर लिया।

विवाह और जीवन साथी

1974 में पूर्णिमा देवी का विवाह उत्तर प्रदेश के जनपद बाराबंकी के नामचीन मशहूर डॉक्टर एचपी दिवाकर से हो गई।जो एक फिजिशियन थे। शादी के दस साल तक एक बेटा और एक बेटी पैदा हुई। डॉक्टर होने के साथ-साथ उनके पति दिवाकर को लिखने का भी शौख था।पूर्णिमा की माने तो उनके पति के लिखे कई गाने जैसे ‘शाम हुई सिंदूरी’ और ‘आज की रात अभी बाकी है’, बॉलीवुड के 70 दशक के फिल्मों में इस्तेमाल किए गए हैं। लेकिन समय ने करवट बदली और परिवार में संपत्ति को लेकर आपसी कलह ने जन्म ले लिया।

1984 में एक जमीनी विवाद के चलते डाक्टर एच पी दिवाकर को गोली मारकर हत्या कर दी गई।पति की मौत के बाद पूर्णिमा अपने ससुर और देवर से परेशान थी, जिसकी वजह से उन्हें संपत्ति में अपना हिस्सा छोड़कर भी पटना विहार आना पड़ा। बाद पूर्णिमा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और आप के गर्दिश का दौर शुरू हो गया। इसी दौरान पूर्णिमा देवी अपने दोनों बच्चों को लेकर पटना विहार मौसी के यहां आ गईं। जब तक मौसी जिंदा थीं सब ठीक था लेकिन उनकी मौत के बाद वो फिर से अकेली हो गईं।मायके वालों ने भी साथ नहीं दिया। जीवन यापन करने के लिए पूर्णिमा ने पटना में उन्होंने कई कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। उनकी आवाज की खूब तारीफ हुई और वो कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हिस्सा बन गई।

1995 में पूर्णिमा का गाया मगही गीत

‘यही ठईया टिकुली हेरा गईल’

बिहार में खूब पसंद किया गया।

पूर्णिमा देवी अपनी कमाई से बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। पटना के एक स्कूल में वो बच्चों को संगीत सिखाने लगी। स्टेज शोज भी किए। बेटा रफी का फैन था वो भी अच्छा गाता था। उसने ऑर्केस्ट्रा ज्वाइन कर लिया और गाने लगा। लेकिन परिवार के दुख देखकर वो खुद को संभाल नहीं पाया और डिप्रेशन में चला गया। बेटी पटना से पढ़ाई करने के बाद मुंबई चली गई। बेटी वहां गई तो कभी नहीं लौटी। कुछ दिन बाद उसके घरवालों ने उसे टीवी सीरियल में देखा, लेकिन वो अपने घरवालों को पहचानने से इनकार करती रही। वो खुद को पटना का ना बताकर गुजरात का बताती है।
पूर्णिमा 1500 रुपये देकर ट्रस्ट द्वारा बनवाए अनुग्रह सेवा सदन में रहती हैं। मंदिर में गाना गाकर उन्हें जो पैसे मिलते हैं उससे वो रूम का किराया भरती हैं। बेटा मानसिक रूप से बीमार था ना वो कुछ कहता है ना कुछ सुनता है। वो बस अकेले ही रहता है।

2002 तक गाड़ी किसी तरह चलती रही। तभी अचानक दो घटनाएं ऐसी हुईं जिन्होंने उन्हें तोड़कर रख दिया। रोजी-रोटी में हाथ बंटाने वाला बेटा एक लड़की से प्यार में धोखा खाकर मानसिक संतुलन खो बैठा। जिस उम्र में मां-बाप संतान से सहारे की आस रखते हैं, उसी उम्र में पूर्णिमा देवी पर ताउम्र बेटे का पेट भरने की जिम्मेवारी आन पड़ी। उधर बेटी जो इंटर की पढ़ाई के साथ-साथ क्लासिकल डांस और नाट्य में पारंगत हो चली थी,उसे भी जमाने की नजर लग गयी। कच्ची उम्र में कदम बहकते देर नहीं लगती। डांस क्लास में आते-जाते किसी ने कैरियर को लेकर उसकी महत्वाकांक्षा को ऐसा बहकाया कि वह एक दिन अपनी बेसहारा मां और विक्षिप्त भाई को छोड़कर मुंबई चली गयी। हिरोइन बनने। उसे आज भी छोटे-मोटे रोल करते सिरियलों में और भोजपुरी फिल्मों में देखा जा सकता है। बकौल पूर्णिमा देवी हाल में उन्होंने उसे पड़ोसी देश के नाम वाली एक भोजपुरी फिल्म में ‘गुजन’ का किरदार निभाते देखा था। खैर, बेटी हिरोइन तो बन गई लेकिन जब मां के दूध का कर्ज उतारने की बारी आई तो उसने मां और भाई की तरफ से साफ मुंह फेर लिया। बताते हैं कि जब एक जानने वाला मुंबई में अपनी पहचान छिपा कर रह रही पूर्णिमा की बेटी से मिला तो उसने पूर्णिमा देवी के अपनी मां होने से ही इनकार कर दिया।

इस अदाकारा को पूर्णिमा बताती बेटी

पूर्णिमा देवी बताती हैं कि ग्लैमर की वह दुनिया छल-कपट से भरी है। उनके पति डाक्टर एचपी दिवाकर चिकित्सक होने के साथ-साथ लिखते भी अच्छा थे। वे अक्सर निर्माताओं और संगीतकारों को अपने लिखे गाने भेजा करते थे। बाॅलिवुड में उनके लिखे कुछ गीत-‘रात अभी बाकी है, बात अभी बाकी है…’ और ‘शाम हुई सिंदुरी…’ इस्तेमाल भी हुए। लेकिन किसी और गीतकार के नाम से। और अब उनकी मासूम बेटी बाॅलीवुड की चकाचैंध में कहीं गुम हो गई। इन सबने उनके मन में सिने-संसार के प्रति नकारात्मकता भर दी। मलाल है तो सिर्फ इतना कि सरकार के लोग और स्वयंसेवी लोग उनसे सहानुभूति तो जरूर जताते हैं, फोटो भी खिंचवाते हैं, घोषणाएं भी करते हैं, लेकिन जब बात वास्तविक मदद की आती है तो सब झूठ ही होता है। इसी क्रम में कुछ स्थानीय एनजीओ वालों ने कालीघाट की पूर्णिमा देवी का इस्तेमाल अपने अभियान को प्रदर्शित-प्रचारित करने में भी किया। बदले में उन्हें कुछ रुपए दे दिए।उम्र के आख़िरी पड़ाव पर गुजारे के लिए जद्दोजहद कर रही पूर्णिमा देवी के लिए ऐसे मौके समस्या का स्थायी हल तो नहीं है। औलाद की तरफ से हताश, समाज-सरकार की बेरुखी से निराश पूर्णिमा देवी ने गंगा को ही अपना सबकुछ मान लिया है-‘सदानीरा गंगा की निरंतरता मुझे प्रेरणा देती है कि संसार पथ में तुम ऐसी ही निरंतरता से बहते जाओ, तमाम गंदगियों पापों को समेटे हुए। जिंदगी के थपेड़ों से न डिगो, कर्मपथ पर बढ़ते जाओ’। मुंह मोड़ लेने वाले गुमनाम परिजनों और समाज से भी वे अपने ही अंदाज में खुद का पक्ष रखती हैं।

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