हीराराम सैन सिरोही संदेश महल समाचार
तहसील क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक धरोहर पंचदेवल (बूटडी) आज उपेक्षा के कारण धीरे-धीरे जर्जर होती जा रही है। यह स्थल क्षत्रिय राव सिरदार एवं महान योद्धा संत शिरोमणि राव वीरानाथ बूटडेसा (वीरसिंह) से जुड़ा हुआ है, जहां आज भी 13वीं शताब्दी की प्राचीन मंदिर स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने देखने को मिलते हैं।
हाल ही में बूटडी के राव सिरदारों—नारायण सिंह, राम सिंह, बलवंत सिंह, हरि सिंह, वीर सिंह, प्रवीण सिंह, हुकम सिंह, भैरू सिंह, सेल सिंह और उत्तम सिंह—ने अपनी पुरातन जागीर पंचदेवल का भ्रमण किया और इस ऐतिहासिक धरोहर की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त की।
स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब दो वर्ष पूर्व इतिहासकार मंगल सिंह रावमादड़ा एवं डॉ. हेमेन्द्र सिंह सारंगदेवोत द्वारा किए गए शोध में प्रकाशित पुस्तक “प्रमर प्रकाश-विलास तेज” में इस स्थल का विस्तृत उल्लेख मिलता है। शोध के मुताबिक, राव वीरानाथ बूटडेसा ने कई युद्धों में भाग लिया और बाद में अपनी बूटडी जागीर छोड़कर पंचदेवल में आकर बस गए, जहां उन्होंने पांच मंदिरों (पंचदेवल) का निर्माण करवाया।
बताया जाता है कि बाद में उन्होंने अपनी जागीर पुत्रों को सौंपकर स्वयं गुरु गोरखनाथ की तपस्या में लीन हो गए। मान्यता है कि गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से उन्हें ‘नाथ-आयस’ की उपाधि और कई सिद्धियां प्राप्त हुईं। इसके बाद वे मेवाड़ की ओर प्रस्थान कर गए, जहां उन्हें हाथीबंध ठिकाने से रावमादड़ा की जागीर प्रदान की गई।
इतिहास के अनुसार, पंचदेवल पर हुए एक भीषण आक्रमण में राव वीरानाथ के पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि महिलाओं ने सती धर्म का पालन किया। यह वंश मूलतः उज्जैन (मालवा) से जुड़ा माना जाता है, जिसका इतिहास चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के समय से जुड़ता है।
आज यह गौरवशाली धरोहर संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों ने प्रशासन से मांग की है कि पंचदेवल मंदिरों के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक विरासत से परिचित हो सकें।