शिक्षा के गलियारों में कोचिंग सेंटरों का व्यवसायीकरण

जेपी रावत/ संदेश महल समाचार 

आज शिक्षा का क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। एक समय था जब विद्यालय और महाविद्यालय ही ज्ञान प्राप्ति के प्रमुख केंद्र माने जाते थे, लेकिन अब कोचिंग सेंटर शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बेहतर अंकों की होड़ ने कोचिंग उद्योग को एक विशाल व्यवसाय का रूप दे दिया है।
कोचिंग संस्थानों का उद्देश्य विद्यार्थियों को अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता प्रदान करना होना चाहिए, किंतु वर्तमान में अनेक संस्थान शिक्षा को सेवा के बजाय लाभ कमाने का साधन मानकर कार्य कर रहे हैं। आकर्षक विज्ञापनों, टॉपरों की तस्वीरों और शत-प्रतिशत सफलता के दावों के माध्यम से अभिभावकों और छात्रों को आकर्षित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञानार्जन से हटकर केवल परीक्षा में सफलता तक सीमित होता जा रहा है।
कोचिंग सेंटरों की बढ़ती फीस मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रही है। कई अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य की चिंता में भारी शुल्क देने को मजबूर हो जाते हैं। वहीं, जो छात्र आर्थिक रूप से कमजोर हैं, वे गुणवत्तापूर्ण कोचिंग से वंचित रह जाते हैं, जिससे शिक्षा में असमानता बढ़ती है।
यह स्थिति विद्यालयी शिक्षा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। यदि छात्रों को सफल होने के लिए कोचिंग पर निर्भर होना पड़े, तो यह विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था की कमजोरियों को दर्शाता है। आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों और कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक शिक्षण पद्धतियां तथा पर्याप्त शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं ताकि विद्यार्थियों को अतिरिक्त कोचिंग की आवश्यकता कम पड़े।
सरकार और शिक्षा विभाग को कोचिंग संस्थानों के संचालन, शुल्क निर्धारण और विज्ञापनों पर प्रभावी निगरानी रखनी चाहिए। साथ ही, विद्यार्थियों और अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि सफलता केवल कोचिंग पर निर्भर नहीं करती, बल्कि परिश्रम, आत्म-अनुशासन और सही मार्गदर्शन से भी प्राप्त की जा सकती है।
शिक्षा एक सामाजिक दायित्व है, केवल व्यापार नहीं। यदि शिक्षा का अत्यधिक व्यवसायीकरण होता रहा तो ज्ञान, नैतिकता और समान अवसर जैसे मूल मूल्य प्रभावित होंगे। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा को व्यवसाय नहीं, राष्ट्र निर्माण के साधन के रूप में देखा जाए।