लेखक जेपी रावत – संपादक संदेश महल
गर्मी उस दिन कुछ ज्यादा ही नाराज़ थी। सूरज मानो आसमान से आग बरसा रहा था। सड़क पर चलते लोगों के चेहरे पसीने से भीगे हुए थे और हवा भी गर्म तवे से उठती लपटों जैसी महसूस हो रही थी।
मैं एक छोटे से कस्बे की सड़क पर चल रहा था। गला सूख रहा था। तभी सड़क किनारे एक पुराना-सा शर्बत का ठेला दिखाई दिया। मिट्टी के घड़े में बर्फ पड़ी थी और उसके ऊपर पानी की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं।
मैंने राहत की सांस ली और ठेले पर जाकर कहा-
भैया, एक गिलास शर्बत देना।
दुकानदार ने जल्दी से एक साधारण-सा गिलास उठाया, शर्बत डाला और मेरी ओर बढ़ा दिया।
मैं अभी पहला घूंट ही लेने वाला था कि तभी एक चमचमाती एसयूवी ठेले के सामने आकर रुकी। गाड़ी से सफेद कुर्ता-पायजामा पहने एक प्रतिष्ठित व्यक्ति उतरे। उनके साथ दो लोग और थे।
उन्हें देखते ही दुकानदार का अंदाज़ बदल गया।
उसने सबसे साफ गिलास निकाला। बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े डाले। ऊपर से गुलाब की कुछ बूंदें मिलाईं और दोनों हाथों से मुस्कुराते हुए शर्बत पेश किया।
लीजिए साहब, ठंडा-ठंडा शर्बत।
मैं चुपचाप यह दृश्य देख रहा था।
तभी मेरी नजर ठेले के दूसरी तरफ खड़े एक दुबले-पतले बुजुर्ग पर पड़ी। फटे हुए कपड़े, पैरों में घिसी हुई चप्पल और चेहरे पर थकान की लंबी लकीरें।
उन्होंने जेब में हाथ डाला। सिक्के गिने। फिर धीमी आवाज़ में पूछा।
बेटा… आधा गिलास मिल जाएगा क्या?
दुकानदार ने बिना उनकी ओर देखे जवाब दिया।
बाबा, यहां आधा गिलास नहीं मिलता।
बुजुर्ग ने फिर जेब टटोली। शायद उम्मीद कर रहे थे कि कहीं कोई और सिक्का निकल आए।
लेकिन जेब खाली थी।
उन्होंने एक बार शर्बत की ओर देखा। फिर सूखे होंठों पर जीभ फेरी और चुपचाप मुड़ गए।
न जाने क्यों मेरा हाथ गिलास पर रुक गया।
मेरे सामने दो गिलास शर्बत थे।
एक वह, जिसे सम्मान के साथ परोसा गया था।
दूसरा वह, जो किसी की पहुंच से बाहर था।
मैंने आवाज़ दी।
बाबा, ज़रा रुकिए।
वे ठिठक गए।
मैंने अपना गिलास उनकी ओर बढ़ा दिया।
उन्होंने संकोच से कहा
नहीं बेटा, तुम पी लो।
मैं मुस्कुराया।
प्यास मेरी थी, लेकिन ज़रूरत आपकी ज्यादा है।
बाबा ने गिलास थामा। कांपते हाथों से एक घूंट लिया।
यकीन मानिए, उस दिन मैंने पहली बार किसी इंसान की आंखों में शर्बत का स्वाद उतरते देखा।
उनकी आंखें नम हो गईं।
उन्होंने कहा-
बेटा, शर्बत तो मीठा है ही… लेकिन आज इंसानियत उससे भी ज्यादा मीठी लगी।
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
एसयूवी जा चुकी थी।
महंगे कपड़ों वाले लोग जा चुके थे।
ठेले पर फिर वही सामान्य चहल-पहल थी।
लेकिन मेरे भीतर कुछ बदल चुका था।
उस दिन समझ आया कि दुनिया में सबसे बड़ी प्यास गले की नहीं होती।
सबसे बड़ी प्यास सम्मान की होती है।
भूख रोटी से मिट जाती है, प्यास पानी से बुझ जाती है, लेकिन उपेक्षा से सूखता हुआ मन केवल अपनापन मांगता है।
घर लौटते समय मेरे मन में बार-बार एक ही बात गूंज रही थी-
समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके अमीर लोग कितना ठंडा शर्बत पीते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके गरीब कितनी इज्जत के साथ पानी पी पाते हैं।
उस दिन सड़क किनारे केवल दो गिलास शर्बत नहीं थे।
एक गिलास में मिठास थी।
दूसरे गिलास में इंसानियत।
और सच कहूं, इंसानियत वाला गिलास ज्यादा मीठा था।
